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शब्दों से उकेरा प्रेम
एक चित्र, एक संकेत और भावनाओं को शब्द देने का रचनात्मक अभ्यास
भूमिका
कभी-कभी एक चित्र पूरा वाक्य कह देता है, लेकिन उसे शब्दों में ढालना उस अनुभूति को एक नया जीवन देना होता है। जब किसी चित्र के भीतर छिपे भाव को पढ़कर मन उसे शब्दों में उकेरने लगता है, तब लेखन केवल अभ्यास नहीं रहता, वह भीतर की अनुभूति का सृजनात्मक रूपांतरण बन जाता है।
इसी भाव-प्रेरणा से चंचलिका जी ने एक खाली कागज़ के टुकड़े पर लिखे संकेत—“प्रेम प्रीत प्यार”—को आधार बनाकर प्रेम को शब्दों की ऐसी पोशाक पहनाई है, जिसमें भाव, कल्पना और आत्मीयता एक साथ दिखाई देती हैं।
काव्य रचना
मन से मन तक
खाली काग़ज़ का टुकड़ा मेरे हाथों में थमाकर
कहा था तुमने—
मुझे प्रेम-पत्र लिखकर भेजना इसमें...
मैंने प्रेम को
अपने मन के सुंदर शब्दों से तुरपाई कर,
भावनाओं के गोटे लगाकर,
ढाई अक्षर की भाषा का जामा पहनाया...
शायद समझ जाओगे—
मन से उपजे,
मन से लिखे,
मन तक पहुँचे
उस प्रेम-पत्र को...
প্রেম প্রীতি ভালোবাসা
খালি কাগজের একটি টুকরো
আমার হাতে দিয়ে তুমি বলেছিলে একদিন..
আমায় একটি প্রেম পত্র লিখে এতে পাঠিয়ে দিও ...
আমি আমার প্রেম কে, মনের সুন্দর শব্দ দিয়ে রিপু করে,
ভাবনার মানিক লাগিয়ে,
আড়াই অক্ষরের জামা পরিয়ে
পাঠালাম...
হয়তো তুমি আমার মন থেকে চাষ হওয়া, মন থেকে লেখা, মন অবধি পৌঁছে যেতে পাওয়া
এই প্রেম পত্রের মর্ম কে....
---চঞ্চলিকা (অনুবাদিকা)

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